खून से लथपथ राजधानी

कल लोकसभा में दिल्ली दंगों पर जवाब देते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि ये दंगे सुनियोजित तरीके से कराए गए, पर इतना कहकर गृहमंत्री पुलिस की नाकामयाबी पर पर्दा नहीं डाल सकते। अगर ये दंगे सच में सुनियोजित थे तो बड़ा सवाल उठता है  खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थी।

                (अमित शाह, चित्र - लोकसभा टीवी)


जल गई राजधानी

सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकार लगातार कई दिन तक शाहीन बाग गए, उन्होंन वहाँ प्रदर्शनकारियों से बातचीत की पर बात आगे नहीं बढ़ सकी। गतिरोध बढ़ता चला गया, ज़ाफराबाद में प्रदर्शनकारियों ने सड़क बंद कर दी।


                 (जलती राजधानी, चित्र - द हिन्दू) 


ज़ाफराबाद रोड़ बंद हो गया, दिल्ली में चुनाव हारी भाजपा को इसमें शाहीन बाग - 2 दिख गया। भाजपा नेता कपिल मिश्रा दल-बल के साथ रोड़ खाली करवाने जाफराबाद पहुंच गए और नेताजी ने अल्टीमेटम दे दिया।



                 (कपिल मिश्रा, चित्र - एनडीटीवी)

नेताजी का अल्टीमेटम ज़रा विवादित लहजे में था तो उसका असर तो होना ही था। दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से से हिन्दू-मुस्लिम झड़पों की खबर आने लगीं। धीरे-धीरे ये झड़पें दंगों में बदल गई और राष्ट्रीय राजधानी का सामाजिक तानाबाना टूट गया। 



                  (अरूण माडर्न स्कूल, बृजपुरी)

दंगाईयों ने धार्मिक स्थल जला दिए, एक-दूसरे समुदाय की दुकानें जला दीं और तो और स्कूल भी जला दिए गए। शायद उन स्कूलों का भी कुछ धर्म रहा होगा जहाँ सबके बच्चे पढ़ते हैं। 




     (पुलिस पर गोोली चलाता शाहरूख, चित्र - पत्रिका) 



लोग एक दूसरे के खून के प्यासे नजर आने लगे, शाहरुख जैसे दंगाई  ने सड़क पर आकर सरेआम गोली चला दी और दिल्ली पुलिस लाचार खड़ी रही। 
पुलिस के एक जवान रतनलाल की मौत हो गई। मामला यहीं नहीं रूका आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा को बेरहमी से मारकर उसकी लाश को नाले में डाल दिया गया। 

                    (ताहिर हुसैन, चित्र - एएनआई) 

अंकित शर्मा की मौत में ताहिर हुसैन नामक एक पार्षद का नाम आ रहा है और दंगा भड़काने में पूर्व विधायक कपिल मिश्रा का। 


टूटा भाईचारा 

यह हिंसा देश की राजधानी में हुई, जिम्मेदारी हर संबंधित व्यक्ति की बनती है। चाहे वो देश का गृहमंत्री हो या पुलिस। दिल्ली में जो खून बहा है वो हिन्दू-मुस्लिम का नहीं बहा, वो हिन्दुस्तान का खून बहा है, वह आपसी भाईचारे का खून बहा है। 

                       (हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा) 


इस दंगे ने ना जाने कितने सचिन और सलीम में दूरियाँ पैदा कर दीं। सियासत है, ना जाने कब तक अपने फायदे के लिए लोगों का खून बहाएगी। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं परन्तु तथ्य इंडियन एक्सप्रेस से लिए गए हैं)

- यतेन्द्र सिंह 

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