बिहार में चढ़ते चुनावी रंग
बिहार में चढ़ते चुनावी रंग
हाल ही में बिहार विधानसभा के बजट सत्र में एनआरसी और एनपीआर को लेकर एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया । क्योंकि जनसंख्या व नागरिकता केन्द्रीय सूची के विषय हैं इसलिए इस प्रस्ताव में बिहार विधानसभा ने केन्द्र से एनआरसी लागू नहीं करने और एनपीआर को 2010 के प्रारूप के अनुसार करने की मांग की है।
राजनीति तो दूसरी तरफ भी खूब चल रही हैं, हाल ही में रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने शरद यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने की मांग की जिसपर राजद ने साफ कर दिया कि चेहरा तो तेजस्वी यादव ही होंगे।
हाल ही में बिहार विधानसभा के बजट सत्र में एनआरसी और एनपीआर को लेकर एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया । क्योंकि जनसंख्या व नागरिकता केन्द्रीय सूची के विषय हैं इसलिए इस प्रस्ताव में बिहार विधानसभा ने केन्द्र से एनआरसी लागू नहीं करने और एनपीआर को 2010 के प्रारूप के अनुसार करने की मांग की है।
वैसे तो कई राज्यों में सीेएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं पर बिहार में जदयू-भाजपा की गठबंधन सरकार है तो एनआरसी - एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव आम बात नहीं रह जाती।
(फाइल फोटो)
बिहार में इस वर्ष साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं तो राजनीतिक सरगर्मियाँ जोरों पर हैं क्योंकि नीतीश कुमार ने एनआरसी का विरोध करके अपने तेवर दिखा दिए हैं।
दिसंबर 2018 से भाजपा एक के बाद एक राज्य में विधानसभा चुनाव हारती जा रही है। अब नीतीश कुमार के बगावती तेवरों ने भगवा दल की चिन्ताएं बढ़ा दी हैं। बिहार के इस विधानसभा सत्र में नीतीश कुमार और तेजस्वी की करीबियां भी खूब दिखी।
अब दो विरोधी मिलें और उसके राजनीतिक निहितार्थ ना निकाले जाएं, ऐसा तो हो नहीं सकता।
बिहार में नीतीश कुमार के फिर से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ जाने की चर्चाएं हो रही हैं। वैसे भी दोनों पार्टियां बिहार में 2015 विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ी थीं।
तो कुछ लोग इसे मोलभाव की राजनीति के रूप में देख रहे हैं, कहा जा रहा है लगातार विधानसभा चुनाव हार रही है और दिल्ली में बुरी तरह हारी भाजपा से नीतीश कुमार ज्यादा सीटें लेने के लिए नए राजनीतिक दांवपेंच आजमा रहे हैं।
(फाइल फोटो)
कुछ दिन पहले जब नीतीश कुमार ने प्रशांत कुमार को जदयू से निकाला तो भाजपा ने जरूर चैन की सांस ली होगी पर फिलहाल तो नीतीश कुमार वही सब कर रहे हैं जिसकी मांग प्रशांत किशोर कर रहे थे।
दरअसल प्रशांत किशोर सीएए और एनआरसी के खिलाफ मुखर रूप से बोल रहे थे। प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार से कई बार बिहार में एनआरसी लागू नहीं करने का अनुरोध किया था। धीरे-धीरे प्रशांत की एनआरसी से नाराजगी नीतीश कुमार से नाराजगी के रूप में बदल गई। आखिरकार उन्हें जदयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
(फाइल फोटो)
अब प्रशांत किशोर ने 'बात बिहार की' नाम का कार्यक्रम शुरू करने जा रहे हैं । जदयू से निकाले जाने के बाद प्रशांत किशोर ने पंचायत स्तर तक लोगों को जोड़ने की बात भी कही है।
उधर जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने भी बिहार में सीएए, एनआरसी, एनपीआर के खिलाफ 'जन-गण-मन यात्रा' की जिसमें खूब भीड़ आई और जमकर पत्थर भी चले।
(फाइल फोटो)
राजनीति तो दूसरी तरफ भी खूब चल रही हैं, हाल ही में रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने शरद यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने की मांग की जिसपर राजद ने साफ कर दिया कि चेहरा तो तेजस्वी यादव ही होंगे।
यहीं नहीं जदयू से अलग होने के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है, प्रशांत किशोर ने कुछ दिन पहले ही दिल्ली में मांझी, कुशवाहा से भी मुलाकात की जिसने नई अटकलों को जन्म दे दिया है।
अब नीतीश भाजपा के साथ रहेंगे या लालू के साथ जाएंगे यह तो आने वाले वक्त ही बताएगा पर जो हो बिहार की राजनीति हर दिन नई करवट ले रही है।





शानदार विश्लेषण.
ReplyDeleteधन्यवाद मित्र
Delete